जीवन जीने की कला
परमात्मा हम सबको सदैव प्राप्त है लेकिन संसार की ममता, कामना और आसक्ति के कारण हमें उनकी विस्मृति हो गई है। इसीलिए नित्य प्राप्त परमात्मा की प्राप्ति के अलौकिक आनंद की अनुभूति नही हो रही है वास्तव में यदि हमें परिवार, समाज और संसार में रहना आ जाए तो मानव मात्र में,बल्कि प्राणी मात्र में हमें प्रभु के दर्शन होंगे शारीरिक रोगऔर मृत्यु का भय हमें सताएगा नही। हमारा मोह सारे संसार में नहीं है हमारा मोह केवल मिले हुए शरीर, संबंधी और समान में है यही छोटा सा परिवार ' हमारा संसार' है। यदि हम परिवार में प्रेमी बनकर रहें, मोही बनकर नहीं तो हमें प्रभु प्राप्ति के दिव्य, चिन्मय, अलौकिक आनंद की अनुभूति हो रहा जाए। तभी हम सुख - दुःख, जन्म- मरण, लाभ - हानि, मान - अपमान, राग द्वेष के बंधन से मुक्त होंगे और यहीं स्वर्ग की अनुभूति होती प्रतीत होगी जिसमें परिवार और समाज में सभी प्रकार के संघर्षों का अंत होगा, परस्पर सेवा त्याग और प्रेम की भावना फले फूलेगी। हमारा जीवन शांति, स्वाधीनता और प्रियता से ओत प्रोत हो जायेगा।

Bahut sunder vichar hai
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