Saturday, 17 June 2023

जीवन जीने की कला

 

जीवन जीने की कला

उमेश चंद्र त्रिपाठी
शिक्षक


परमात्मा हम सबको सदैव प्राप्त है लेकिन संसार की ममता, कामना और आसक्ति के कारण हमें उनकी विस्मृति हो गई है। इसीलिए नित्य प्राप्त परमात्मा की प्राप्ति के अलौकिक आनंद की अनुभूति नही हो रही है वास्तव में यदि हमें परिवार, समाज और संसार में रहना आ जाए तो मानव मात्र में,बल्कि प्राणी मात्र में हमें प्रभु के दर्शन होंगे शारीरिक रोगऔर मृत्यु का भय हमें सताएगा नही। हमारा मोह सारे संसार में नहीं है हमारा मोह केवल मिले हुए शरीर, संबंधी और समान में है यही छोटा सा परिवार ' हमारा संसार' है। यदि हम परिवार में प्रेमी बनकर रहें, मोही बनकर नहीं तो हमें प्रभु प्राप्ति के दिव्य, चिन्मय, अलौकिक आनंद की अनुभूति हो रहा जाए। तभी हम सुख - दुःख, जन्म- मरण, लाभ - हानि, मान - अपमान, राग द्वेष के बंधन से मुक्त होंगे और यहीं स्वर्ग की अनुभूति होती प्रतीत होगी जिसमें परिवार और समाज में सभी प्रकार के संघर्षों का अंत होगा, परस्पर सेवा त्याग और प्रेम की भावना फले फूलेगी। हमारा जीवन शांति, स्वाधीनता और प्रियता से ओत प्रोत हो जायेगा।  





Thursday, 26 September 2013

नौकरी उन्मुख शिक्षा


नौकरी उन्मुख शिक्षा









शिक्षा के मूल सिद्धांतों को भारतीय संस्कृति में समाहित कर के ही संस्कारित मर्यादित शिक्षा का पथ पढ़ा जा सकता है|

Thursday, 5 September 2013

aaj ki adhunik siksha samaj ko nai disa dene me saksham nahi hai isliye jab tak siksha me prachin siksha ke sidhanto ka samaves nahi hoga tab tak bharat me samaj ka bahumukhi vikas sambhav nahi hai.society me logo me child education  ke prati jagruk hona chahiye, kyo ki samaj child kin kin environments se hokar gujarata hai , iski khabar parents ko honi chahiye , tabhi boys/ girls  ke charitrik vikash ki kalpana kar sakte hai, aur unhe rojgar parak siksha dilane me sahayak ban sakte hai.